सफर का मुसाफिर
सफर का मुसाफिर सफर मे रहा
एक नाजनीन ख्वाब नजर मे रहा
सुन रहा था तेरी अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू
न होश मे था न इख़्तियार मे रहा
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उम्मीद न थी तेरे आने कि फिर भी
दर्द-ए-दिल बस इन्तजार मे रहा
आवाज देता रहा चाँद सहर तक
शब का सारा इल्जाम मेरे सर रहा
शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब क्यो है "रुद्र"
ये जालिम अंधेरा ही तकदीर मे रहा
- Maharudra Doiphode
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