मेरा खयाल था शायद - महारुद्र
चंद लम्हों का एक सवाल था शायद
कुछ नही मेरा खयाल था शायद
दीदा-ए-बेदार थे राह मे जिनकी
जो दिखा था ओ कोहरा था शायद
हर जगह खामोश ही रहा हू अक्सर
ताक़त-ए-गुफ़्तार सा नही था शायद
मै नही गया था महफ़िल मे जिन की
उस जुबाँ पे मेरा नाम नही था शायद
लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर के लिए
जो देखा था वो महताब था शायद
गझलो की आरास लिख रहा है "रुद्र"
किसी का जज़्ब बे-पनाह था शायद
" Maharudra Doiphode Poems "
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" Mera Khayal Tha Shayad Maharudra Doiphode "


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