उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाते, हमें ये उम्मीद वो पुकारें है
नाम होंठों में अब भी लेकिन, आवाज़ में पड़ गई दरारें
दुआ मे उसको माँग कर देखते है - रुद्र टपकते हुए कतरा-ए-शबनम को देखते है पीते नही…
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