दर्द हल्का है साँस भारी है - गुलजार
दर्द हल्का है साँस भारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
आप के बाद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
आप के साथ ही गुज़ारी है
रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
दिन की चादर अभी उतारी है
दिन की चादर अभी उतारी है
शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले
कैसी चुप सी चमन पे तारी है
कैसी चुप सी चमन पे तारी है
कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है
आज की दास्ताँ हमारी है
Dird Halka Hai Sans Bhari Hai Jiye Jane Ki Rasm Jari Hai Gulazar Poetry

0 Comments