मान रहा है क्यों हार तू - महारुद्र
चमक रहे हैं निशान पाँव के
पीछे मुड़कर देख तू
चलते रहना आदत तेरी
खुद को यू मत रोक तू
खो गए जो स्वप्न सारे
लाएगा उनको समीप तू
फिर, मान रहा है क्यों हार तू ...
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तम से भरा ये जग दिखे
तब चलना ज्वाला लेकर तू
हाथों में यू हाथ समेटे
न राह किसी की निहार तू
जिंदा रहने का जज्बा है तुझमे
ऐसे मत तितर बितर तू
फिर, मान रहा है क्यों हार तू...
अंधेरों के खोंफ से तेरी
राह छोड़ मत भाग तू
मौत से पहले मत मर,
कर दे डर का त्याग तू
इस जीवन के रंगमंच पर
कुछ पल का किरदार तू
फिर, मान रहा है क्यों हार तू...
___ Maharudra Doiphode
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